प्रेम की परिभाषा
पवन हौले से
भीगे गालों को छू जाए,
अंदर के द्वंद्व को
जब शब्द न मिल पाए,
निंद्रा दरकिनार हो,
जागते नयन सपनों में खो जाए,
लफ्जों का ऊफान
भी जब संवाद ना बना पाए,
प्रेम तो बस ऐसे
आप ही परिभाषित हो ।।
जब बहते अश्रुओं के
पास पूरी कहानी हो,
जब कुछ पल का
गुज़र जाना गवारा ना हो,
जब समय लम्हे में ही
ठहर जाता हो,
लबों पे चहकते
राज़ का पहरा हो,
मौन में, अधरों पे,
मंद मुस्कान हो,
इनकार इकरार से परे,
अहसास हर धड़कन में हो,
प्रेम तो बस ऐसे
आप ही परिभाषित हो ।।
जब करुणा की हृदय में
कंपन हो,
जब खाने का हर निवाला,
कृतज्ञता से रसमय हो,
जब मातृत्व ही एकमात्र
पहचान हो,
जब 'मैं' का पूर्ण
विलय हो,
प्रेम तो बस ऐसे
आप ही परिभाषित हो ।।
जब ये अस्तित्व ढूंढना
नामुमकिन हो,
जैसे मीरा की अलौकिक
भक्ति हो,
जैसे राधा - कृष्णा का
अद्वितीय मिलन हो,
महादेव के डमरू संग,
वैराग्य में लिप्त हो,
जब अद्वैत साक्षात
अनुभव में हो,
ओमकार हृदय के
हर स्पंदन में हो,
जब हर रूप में हरि
रूबरू हो,
प्रेम तो बस ऐसे
आप ही परिभाषित हो ।।
© Shalu Makhija
8th May, 2026

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